कबिता✍️सति बेहुला के अमर प्रेम
------ बज्जिका दर्पण------
मुकेश मिश्र
मलंगवा-८,सर्लाही
धूप तने, अन्हरिया छाए,
नदिया अगिया जइसन बहाए,
हम ना डरब, हम ना हटब,
संग सजन के प्रीत निभाए।
नाव चढ़ा के लाश के लेलीं,
गंगा माई से बात कहलीं,
बिहुला के मन में बल भारी,
साँच कह
ब, ना कोनो लाचारी।
चांद सौदागर शिव के पूजलक,
मने ना विषहरी के गोस,
नागिन भेजल लखिंदर काटे,
सो गईल सुहाग के जोस।
बिहुला ना रोइल, ना काँपल,
दूध जइसन हिय आउर धैर्य,
नावे चढ़ के चल पड़लीं,
स्वर्ग लोक के मांगे न्याय।
देवता सभ चुप्पे भइल,
बिहुला के बात असर कर गेल,
मां विषहरी दिल पिघलाइल,
प्रीत के बल सबसे भारी कहल।
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