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Sunday, August 17, 2025

"बज्जिका दर्पण" दुलदुल घोड़ाके नाच अब लोप होइत जा रहल हए

  


पहिले दुलदुल घोडा गाँव, घर-शहर  बजारमे अबइत रहलक हअ । बाँसके बती/करची आ लोहाके तारसे घोड़ाके आकार रुपरंङ्ग बनाकरके कपड़ा रंगीचंगी आ कागज लपेट करके बीचमे ऐगो मर्द आदमी पइस जाईत रहलक हअ । माथामे मुरेठा, गोड़मे घुघरु आ हाथमे चभकी लेके कुदइत घरघरसे भीख मंडईत रहलक हअ । अगहन धनकटिआके समयमे विशेषकर के दुलदुल घोडा देखेके लेल गाँव-घर-शहर बजारके लइकासब दुलदुल घोड़ाके पछाड़ि-पछाड़ि दउड़इत रहलक हअ । दुलदुल घोड़ा देखके लइकासब बहुत खुशी होकरके मनोरञ्जनके आनन्द लेइत रहलक हअ । मधेश प्रदेश आ भारतके उत्तरी प्रान्तमे ऐगो बहुत बड़का मनोरंञ्जन आ साधनके साथ संस्कृति भी रहलक हअ । बच्चा, जवान, बुढ़, मर्द, स्त्री, कनिआ, बहुरीआ सबके सब घरमे से बाहर निकलके दुलदुल घोड़ा देखइत रहलक हअ । गाँव घरके सड़कपर ऐनेसे ओने दउड़इत रहलापर लइकासब भी पछाड़ि-पछाड़ि दउड़इत रहलक हअ । धनी, गरिब, राजा, रंङ्ग सबके घरमे जाके प्रेमसे भीख मगइत रहलक हअ । पाँच आदमीके समूहमे चलइत रहलक हअ दुलदुल घोड़ा । ऐगो आदमी घोड़ाके दउड़वइत रहलक हअ, दोसर आदमी कपड़ाके धोकरी बनाके कन्हौमे लटकएले भीखके लेल आ बोरा लेले रहइत, तेसर आदमी ढ़ोल बजबइत रहइत, चौथा आदमी झाल बजबइत आ पाँचवा आदमी पिपही बजबइत गाँवमे घुमइत रहलक हअ । दुलदुल घोड़ाके नाच अब लोप होइत जा रहल हए । मनोरञ्जनके लेल बहुत हिँ आर्कषक आ बढ़ीआ चीज रहलक हब ।

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